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अल्मोड़ा में ट्रेड यूनियन हड़ताल, श्रम संहिताओं के खिलाफ प्रदर्शन

12 फरवरी 2026 को अल्मोड़ा के चौहान पाटा में केंद्रीय ट्रेड यूनियन के आह्वान पर देशव्यापी हड़ताल के समर्थन में सभा और प्रदर्शन आयोजित किया गया। इस दौरान विभिन्न मजदूर संगठनों, कर्मचारी संघों और किसान संगठनों ने केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ जोरदार विरोध दर्ज कराया।

सभा में वक्ताओं ने चार नई श्रम संहिताओं को “काले कानून” बताते हुए उन्हें तत्काल निरस्त करने की मांग उठाई। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि इन श्रम संहिताओं से मजदूरों के अधिकार कमजोर होंगे और कॉर्पोरेट हितों को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा कि इन कानूनों के लागू होने से श्रमिक सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

ग्रामीण क्षेत्रों से आए मजदूरों ने मनरेगा से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। उनका कहना था कि मनरेगा कानून में किए गए बदलावों ने रोजगार के अवसरों को सीमित कर दिया है। उन्होंने मांग की कि मनरेगा को पूर्व स्वरूप में बहाल किया जाए और ग्रामीण रोजगार की गारंटी सुनिश्चित की जाए।

किसान सभा से जुड़े वक्ताओं ने बिजली विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि इससे कृषि क्षेत्र पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। उन्होंने खाद्य सब्सिडी बढ़ाने और किसानों के लिए समर्थन नीतियों को मजबूत करने की मांग की। उनका तर्क था कि खुले बाजार की नीतियां छोटे किसानों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकती हैं।

सभा में बीएसएनएल कर्मचारियों ने भी अपनी समस्याएं रखीं। उन्होंने आरोप लगाया कि अल्मोड़ा में कार्यरत कर्मचारियों को पिछले दस महीनों से वेतन नहीं मिला है। इससे कर्मचारियों और उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है। इस मुद्दे ने प्रदर्शन को भावनात्मक और गंभीर स्वरूप दे दिया।

वक्ताओं ने केंद्र सरकार की आर्थिक और विदेशी नीतियों पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि अंतरराष्ट्रीय समझौतों और व्यापारिक नीतियों का असर सीधे मजदूर और किसान वर्ग पर पड़ सकता है। उन्होंने आशंका जताई कि टैरिफ में कमी और खुले बाजार की नीति से कपास, सोयाबीन और डेयरी क्षेत्र के किसानों को नुकसान हो सकता है।

सभा में देश की संप्रभुता और आर्थिक नीतियों पर भी चर्चा हुई। कुछ वक्ताओं ने पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर उठे कुछ अंतरराष्ट्रीय मुद्दों का उल्लेख किया। हालांकि इन विषयों पर आधिकारिक पुष्टि या सरकारी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

उत्तराखंड सरकार की नीतियों पर भी प्रदर्शनकारियों ने आलोचना की। उनका आरोप था कि प्रदेश में सामाजिक और राजनीतिक वातावरण में ध्रुवीकरण की प्रवृत्ति बढ़ रही है। प्रदर्शनकारियों ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंता का विषय बताया।

सभा के बाद पूरे शहर में जुलूस निकाला गया। प्रदर्शनकारियों ने श्रम संहिताओं को वापस लेने, मजदूर अधिकारों की बहाली और रोजगार सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग को लेकर नारेबाजी की। जुलूस शांतिपूर्ण बताया गया।

धरना-प्रदर्शन में विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। सीआईटीयू के जिला सचिव आरपी जोशी सहित कई सामाजिक और श्रमिक संगठनों के पदाधिकारियों ने भागीदारी की। कार्यक्रम का संचालन युसूफ तिवारी द्वारा किया गया।

यह प्रदर्शन केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय श्रम नीतियों, ग्रामीण रोजगार, सार्वजनिक क्षेत्र की स्थिति और किसान हितों से जुड़ा व्यापक आंदोलन का हिस्सा था। विशेषज्ञों का मानना है कि देशभर में हो रहे ऐसे विरोध प्रदर्शनों से यह संकेत मिलता है कि श्रम और कृषि नीतियां राजनीतिक विमर्श के केंद्र में बनी हुई हैं।

आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन मांगों पर किस प्रकार प्रतिक्रिया देती है। यदि संवाद की प्रक्रिया मजबूत होती है तो समाधान की दिशा निकल सकती है, अन्यथा आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।

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