जब गोलियों की आवाज़ ने रूस में क्रांति की नींव रख दी
इतिहास में आज
22 जनवरी 1905
इतिहास में कुछ दिन ऐसे होते हैं जब जनता की उम्मीदें और सत्ता की बेरुख़ी आमने-सामने आ जाती हैं। 22 जनवरी 1905 ऐसा ही एक दिन था, जब रूस की राजधानी सेंट पीटर्सबर्ग में शांतिपूर्ण प्रदर्शन गोलियों की गूंज में बदल गया। यह घटना आगे चलकर “ब्लडी संडे” के नाम से जानी गई और इसी ने रूसी क्रांति की पहली चिंगारी को हवा दी।
उस सुबह हज़ारों मज़दूर, अपने परिवारों के साथ, हाथों में धार्मिक प्रतीक और याचिकाएँ लिए विंटर पैलेस की ओर बढ़ रहे थे। उनका उद्देश्य सत्ता को चुनौती देना नहीं, बल्कि अपनी दुर्दशा से अवगत कराना था। कम मज़दूरी, लंबा कार्य-समय और अमानवीय परिस्थितियाँ—इन सबके समाधान की उम्मीद लेकर वे ज़ार निकोलस द्वितीय तक पहुँचना चाहते थे।
लेकिन सत्ता ने संवाद के बजाय दमन का रास्ता चुना। सैनिकों ने भीड़ पर गोली चला दी। सैकड़ों लोग मारे गए और अनगिनत घायल हुए। यह क्षण केवल एक हिंसक कार्रवाई नहीं था; यह वह बिंदु था जहाँ रूस की जनता का अपने शासक पर से विश्वास टूट गया। “ज़ार पिता” की छवि, जो अब तक संरक्षण का प्रतीक मानी जाती थी, उसी दिन ढह गई।
ब्लडी संडे के बाद रूस भर में हड़तालें, विद्रोह और असंतोष फैल गया। रेलमार्ग ठप हुए, कारखाने बंद हुए और सेना के भीतर भी असंतोष पनपने लगा। यद्यपि 1905 की क्रांति तत्काल सत्ता परिवर्तन नहीं ला सकी, लेकिन इसने 1917 की महान रूसी क्रांति की वैचारिक और सामाजिक भूमि तैयार कर दी।
22 जनवरी 1905 यह दिखाता है कि इतिहास केवल सत्ता के निर्णयों से नहीं, बल्कि जनता की टूटी उम्मीदों से भी आकार लेता है। जब शांतिपूर्ण आवाज़ों को गोलियों से दबाया जाता है, तब वे आवाज़ें समय के साथ क्रांति का रूप ले लेती हैं। यही कारण है कि ब्लडी संडे आज भी विश्व इतिहास में सत्ता और जनता के रिश्ते पर एक कठोर प्रश्नचिह्न की तरह दर्ज है।
