अल्मोड़ा ने अपने वीर सपूत को दी अंतिम विदाई, लेफ्टिनेंट बीरेश्वर गोस्वामी पूरे सैन्य सम्मान के साथ पंचतत्व में विलीन
अल्मोड़ा | 07 जून 2026 | LokLens News Desk
अल्मोड़ा | 07 जून 2026 | LokLens News Desk
उत्तराखंड की वीरभूमि अल्मोड़ा ने रविवार को अपने एक और वीर सपूत को नम आंखों से अंतिम विदाई दी। जम्मू-कश्मीर के राजौरी क्षेत्र में सैन्य अभियान के दौरान शहीद हुए भारतीय सेना की 5 असम रेजिमेंट के युवा अधिकारी लेफ्टिनेंट बीरेश्वर गोस्वामी का अंतिम संस्कार पूरे सैन्य और राजकीय सम्मान के साथ संपन्न हुआ।
मात्र 25 वर्ष की आयु में मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान देने वाले लेफ्टिनेंट बीरेश्वर गोस्वामी का पार्थिव शरीर सेना के हेलीकॉप्टर द्वारा अल्मोड़ा लाया गया। उनके अंतिम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक, जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी, सैन्य अधिकारी और युवा मौजूद रहे। पूरे क्षेत्र में शोक और गर्व का माहौल दिखाई दिया।
शहीद अधिकारी के पार्थिव शरीर को श्रद्धांजलि देने के बाद अंतिम संस्कार के लिए विश्वनाथ घाट ले जाया गया। यहां भारतीय सेना ने सैन्य परंपराओं के अनुसार शस्त्र झुकाकर और गार्ड ऑफ ऑनर देकर अपने वीर साथी को अंतिम सलामी दी। सैन्य सम्मान के साथ हुए अंतिम संस्कार के दौरान उपस्थित लोगों ने “भारत माता की जय” और “वीर शहीद अमर रहें” के नारों के बीच अपने वीर सपूत को अंतिम विदाई दी।
इस अवसर पर जिलाधिकारी अंशुल सिंह ने गहरा दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि राष्ट्र की रक्षा के लिए लेफ्टिनेंट बीरेश्वर गोस्वामी द्वारा दिया गया सर्वोच्च बलिदान सदैव स्मरणीय रहेगा। उन्होंने कहा कि उनकी शहादत आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रसेवा और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा देती रहेगी। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक चंद्रशेखर आर. घोड़के, अपर जिलाधिकारी युक्ता मिश्र तथा सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी पुष्पचक्र अर्पित कर श्रद्धांजलि दी और शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदनाएं व्यक्त कीं।
जब कोई सैनिक सीमा पर राष्ट्र की रक्षा करते हुए शहीद होता है, तो उसका बलिदान केवल एक परिवार का नहीं बल्कि पूरे देश का नुकसान होता है। शहीद के परिवार को अपूरणीय व्यक्तिगत क्षति का सामना करना पड़ता है, जबकि समाज एक ऐसे युवा को खो देता है जो देश की सुरक्षा के लिए समर्पित था।
उत्तराखंड जैसे राज्यों में, जहां बड़ी संख्या में युवा सेना में सेवा देते हैं, ऐसी शहादतें पूरे समाज को भावुक कर देती हैं। शहीदों की अंतिम यात्रा में उमड़ने वाली भीड़ केवल श्रद्धांजलि नहीं होती, बल्कि राष्ट्र के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक भी होती है।
उत्तराखंड को लंबे समय से “सैनिकों की भूमि” और “वीरभूमि” के रूप में जाना जाता है। राज्य के हजारों परिवार भारतीय सेना और अर्धसैनिक बलों में अपनी सेवाएं देकर देश की सीमाओं की रक्षा में योगदान देते हैं। ऐसे में जब कोई युवा अधिकारी अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए सर्वोच्च बलिदान देता है, तो वह केवल एक सैन्य घटना नहीं रह जाती, बल्कि पूरे समाज के लिए गर्व और शोक का साझा क्षण बन जाती है।
लेफ्टिनेंट बीरेश्वर गोस्वामी की शहादत यह याद दिलाती है कि देश की सुरक्षा के पीछे हजारों सैनिकों का त्याग, अनुशासन और समर्पण छिपा होता है। जब देश के नागरिक अपने दैनिक जीवन में सुरक्षित महसूस करते हैं, तो उसके पीछे सीमाओं पर तैनात ऐसे ही जवानों का अथक योगदान होता है।
25 वर्ष की आयु में दिया गया यह बलिदान केवल एक सैन्य उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति, साहस और कर्तव्य के सर्वोच्च आदर्श का उदाहरण है। आने वाले वर्षों में भी लेफ्टिनेंट बीरेश्वर गोस्वामी का नाम उत्तराखंड और देश के युवाओं को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित करता रहेगा।
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