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केंद्रीय बजट में महिलाओं की अनदेखी पर जनवादी समिति का रोष

LOKLENS NEWS |नई दिल्ली/उत्तराखंड।

केंद्रीय बजट 2026–27 में महिलाओं से जुड़े मदों में भारी कमी और जेंडर बजटिंग में गिरावट को लेकर अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति ने तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की है। समिति की प्रांतीय अध्यक्ष Sunita Pandey ने बजट को “महिला विरोधी” और “जनता विरोधी” बताते हुए कहा कि सरकार ने महिलाओं की दैनिक समस्याओं को नज़रअंदाज़ कर दिया है, जबकि बजट भाषण में महिलाओं का उल्लेख केवल औपचारिकता भर रहा। उन्होंने कहा कि वित्त मंत्री द्वारा “महिलाओं” शब्द का पाँच बार उपयोग करने से वास्तविक समस्याएँ हल नहीं होतीं, जब तक बजट में उनके लिए ठोस राहत न दी जाए।

समिति द्वारा जारी प्रेस नोट में कहा गया कि महँगाई, बेरोजगारी, गरीबी, कुपोषण, असुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी—इन सभी मोर्चों पर महिलाएँ सबसे अधिक प्रभावित हैं, लेकिन बजट में इनमें से किसी भी समस्या पर राहत देने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए। सबसे अधिक चिंता का विषय यह बताया गया कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का बजट पिछले वर्ष के कुल बजट के 0.53% से घटकर केवल 0.05% रह गया है, जो दर्शाता है कि सरकार महिलाओं के मुद्दों को प्राथमिकता ही नहीं दे रही।

जनवादी महिला समिति ने जेंडर बजटिंग में गिरावट को भी बेहद गंभीर बताया। समिति ने कहा कि जेंडर बजट देश की GDP के 1.61% से घटकर 1.38% हो गया है, जो महिलाओं के लिए योजनाओं को कमजोर करने का स्पष्ट संकेत है। यह घटाव इस बात का प्रमाण है कि महिलाओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका के लिए आवश्यक योजनाओं को पर्याप्त वित्तीय समर्थन नहीं दिया जा रहा।

प्रेस बयान में यह भी उल्लेख किया गया कि वित्त मंत्री ने प्रयोगशालाओं में लंबे समय तक कार्यरत छात्राओं के लिए जिला स्तर पर महिला हॉस्टल खोलने की घोषणा की है, लेकिन यह कदम महिलाओं की वास्तविक समस्याओं को संबोधित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। समिति ने कहा कि देश में बढ़ते अपराध, सुरक्षा की कमी और महिलाओं के खिलाफ हिंसा का जिक्र तक न होना यह दर्शाता है कि सरकार जमीनी समस्याओं को अनदेखा कर रही है।

समिति ने बजट में किए गए कटौतियों का विस्तृत विवरण देते हुए कहा कि “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ”, वन स्टॉप सेंटर, महिला हेल्पलाइन, नारी अदालत जैसी योजनाओं के आवंटन में भी कमी की गई है। इन योजनाओं पर कुल खर्च को 629 करोड़ से घटाकर 627 करोड़ कर दिया गया है, जो महिलाओं को न्याय, सुरक्षा और सहायता प्रदान करने वाली मूलभूत सुविधाओं को कमजोर करता है।

इसके अलावा, जनवादी महिला समिति ने कई अन्य केंद्रीय योजनाओं के बजट में की गई कटौतियों पर भी सवाल उठाए। इसमें राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, पीएम पोषण, पीएम श्री, पीएम जेएवाई, पीएम आवास योजना जैसी योजनाएँ शामिल हैं, जिनमें कमी से ग्रामीण और शहरी गरीब महिलाओं की समस्याएँ और बढ़ेंगी। समिति ने कहा कि उर्वरक और खाद्य सब्सिडी में कटौती का सीधा असर किसानों और गरीब परिवारों की महिलाओं पर पड़ेगा, क्योंकि भोजन और खेती पहले से ही महँगी होती जा रही है।

समिति ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में आवंटन न बढ़ाए जाने पर भी नाराज़गी जताई। समिति के अनुसार, आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं के लिए यह प्रणाली जीवनरेखा की तरह है और इसका मज़बूत होना अत्यंत आवश्यक है। आंगनवाड़ी, आशा और मिड-डे-मील जैसी महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराने वाली योजनाओं में भी कोई वृद्धि नहीं की गई, जिससे लाखों महिला कर्मियों को निराशा हुई है।

प्रेस नोट में जनवादी महिला समिति ने माइक्रोफाइनेंस कंपनियों द्वारा गरीब महिलाओं के शोषण का मुद्दा भी उठाया। समिति ने कहा कि बजट में “इननोवेटिव फाइनेंस” पर चुप्पी यह दिखाती है कि सरकार माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के बढ़ते दायित्व और ब्याज दरों के बोझ को कम करने के लिए गंभीर नहीं है। महिलाओं के स्वास्थ्य, विशेषकर एनीमिया की गंभीर समस्या पर भी बजट में पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया, जबकि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS) में यह समस्या प्रमुख रूप से उजागर हुई है।

समिति ने वित्त मंत्री द्वारा “केयर वर्क” के लिए ट्रेनिंग की घोषणा को अधूरा प्रयास बताया। उनका कहना है कि देश में महिलाओं पर बिना वेतन वाले देखभाल कार्य का बोझ लगातार बढ़ रहा है, लेकिन सरकार ने इन्हें आर्थिक या सामाजिक मान्यता देने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। साथ ही वंचित समुदायों की महिलाओं के लिए वास्तविक बजटीय आवंटन में भी भारी कमी देखी गई है, जो सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के सिद्धांतों के विरुद्ध है।

अंत में, अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति ने बजट 2026–27 को “महिला विरोधी” बताते हुए उसके खिलाफ लामबंद होने का आह्वान किया है। समिति ने कहा कि यह बजट उन वंचित और गरीब महिलाओं की चिंताओं को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करता है, जो देश की सबसे अधिक प्रभावित और मेहनतकश आबादी का हिस्सा हैं। समिति ने महिलाओं से अपील की है कि वे इस बजट के विरोध में एकजुट होकर अपनी आवाज़ उठाएँ।

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