भारत में बच्चों का स्वास्थ्य संकट: दमा–एलर्जी 44% बढ़ी
LOKLENS NEWS|भारत|
भारत में बच्चों का स्वास्थ्य एक गंभीर मोड़ पर पहुँच चुका है और नई चिकित्सा रिपोर्टों ने इस संकट को पहले से कहीं अधिक स्पष्ट और चिंताजनक रूप में सामने रखा है। All India Institute of Medical Sciences (AIIMS) की नवीनतम बाल-स्वास्थ्य रिपोर्ट के अनुसार देश में पिछले पाँच वर्षों में बच्चों में दमा (Asthma) और एलर्जी के मामले 44% बढ़े हैं। रिपोर्ट साफ कहती है कि यह वृद्धि सामान्य नहीं, बल्कि एक उभरती हुई “pediatric health emergency” है, जिसका कारण तेजी से बदलते मौसम पैटर्न, प्रदूषित हवा, शहरी धूल, औद्योगिक उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन का सम्मिलित प्रभाव है। विशेषज्ञों का कहना है कि आज भारत में जन्म लेने वाले बच्चों को पहले की तुलना में कहीं अधिक कमजोर पर्यावरण मिल रहा है, जो उनके फेफड़ों, प्रतिरोधक क्षमता और समग्र विकास को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है।
AIIMS की रिपोर्ट बताती है कि भारत में हवा की गुणवत्ता अब बच्चों के लिए सबसे बड़ा स्वास्थ्य जोखिम बन चुकी है। प्रदूषित हवा में मौजूद PM2.5 और PM10 कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि वे बच्चों के फेफड़ों में सीधे प्रवेश कर जाते हैं। अधिकांश भारतीय शहर साल के 10 महीने WHO की सुरक्षित सीमा से 8–10 गुना अधिक प्रदूषण झेलते हैं। जब एक वयस्क को यह हवा नुकसान पहुँचाती है, तो एक छोटे बच्चे के फेफड़ों पर इसका प्रभाव कई गुना अधिक पड़ता है, क्योंकि उनका श्वसन-तंत्र अभी विकसित हो रहा होता है। यही कारण है कि 5 साल से कम उम्र के बच्चों में दमा, सांस फूलना, घरघराहट, एलर्जी और बार-बार आने वाले संक्रमण तेजी से बढ़ रहे हैं। AIIMS के अनुसार देश के बड़े शहरों—दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, चेन्नई, लखनऊ, पटना—में प्रदूषण से प्रभावित बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है और अस्पतालों में बाल श्वसन रोगों के मामले लगभग दोगुने हो गए हैं।
जलवायु परिवर्तन इस संकट को और बिगाड़ रहा है। बढ़ते तापमान, अनियमित मौसम, लंबे समय तक चलने वाली गर्म हवाएँ और असामान्य वर्षा बच्चों के स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव डाल रही हैं। ह्यूमिडिटी बढ़ने से एलर्जेन अधिक सक्रिय हो जाते हैं, और हवा में मौजूद परागकण, धूल-मिट्टी और फंगस बच्चों के फेफड़ों को और अधिक संवेदनशील बना देते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि भारत के कई शहर अब “Climate–Pollution Overlap Zone” बन गए हैं—ऐसी जगहें जहाँ मौसम और प्रदूषण मिलकर बच्चों में दीर्घकालिक बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ा देते हैं।
AIIMS ने अपनी रिपोर्ट में विशेष रूप से 5 साल से कम उम्र के बच्चों को सबसे ज्यादा जोखिम में बताया है। इस आयु वर्ग के बच्चे अपने वातावरण पर सबसे अधिक निर्भर होते हैं और उनकी प्रतिरोधक क्षमता पूरी तरह विकसित नहीं होती। यह अध्ययन बताता है कि इस उम्र के बच्चे बाहर खेलने, स्कूल जाने, धूल वाले वातावरण में सांस लेने और प्रदूषित क्षेत्रों में सामान्य गतिविधियों के दौरान सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे बच्चों के फेफड़ों को होने वाला नुकसान भविष्य में उनके पूरे जीवन को प्रभावित कर सकता है और यह क्षति कई मामलों में स्थायी भी हो सकती है।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि घरों के भीतर का वायु प्रदूषण (Indoor Pollution) भी बड़े खतरे के रूप में उभर रहा है। LPG, धुआँ, अगरबत्ती, कीटनाशक स्प्रे, पेंट की गंध, और किचन एग्जहॉस्ट की कमी भी बच्चों में एलर्जी और दमा को बढ़ाती है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में घरेलू प्रदूषण एक बड़ा कारक बन चुका है। कई परिवारों में बच्चे धूल, पेट–एलर्जी, त्वचा–एलर्जी और फेफड़ों के संक्रमण से बार-बार पीड़ित हो रहे हैं।
भारत के प्रमुख बाल-रोग विशेषज्ञों ने कहा है कि देश “Pediatric Health Emergency” की ओर बढ़ रहा है, जहाँ बच्चों में दीर्घकालिक फेफड़ों की बीमारियाँ सामान्य होती जा रही हैं। कई डॉक्टरों का मानना है कि बच्चों के लिए स्वच्छ हवा और सुरक्षित वातावरण अब केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं, बल्कि भविष्य की जनसंख्या की गुणवत्ता का विषय बन चुका है। यदि यह स्थिति नियंत्रित नहीं हुई, तो आने वाले दशकों में वयस्कों में दमा, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव लंग डिजीज (COPD), एलर्जी, प्रतिरोधक क्षमता की कमजोरी और हृदय रोगों में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है।
AIIMS ने सरकार और परिवारों दोनों को चेताया है कि बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है। स्कूलों में एयर क्वालिटी मॉनिटर, घरों में वेंटिलेशन, गैसों और धूल से सुरक्षा, हरित क्षेत्र बढ़ाना और बड़े शहरों में वाहनों तथा निर्माण–धूल पर नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है। प्रदूषण को कम करने वाली नीतियाँ यदि आने वाले वर्षों में प्रभावी रूप से लागू नहीं की गईं, तो भारत में बच्चों की सेहत को अपूरणीय क्षति हो सकती है।
कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट बताती है कि भारत का भविष्य आज उसके बच्चों की सांसों में छिपा है। प्रदूषित हवा और जलवायु परिवर्तन बच्चों के फेफड़ों पर जो प्रहार कर रहे हैं, वह केवल आज की समस्या नहीं—बल्कि आने वाली पूरी पीढ़ियों का संकट है। AIIMS की इस चेतावनी को नज़रअंदाज़ करना अब किसी भी देश, शहर या परिवार के लिए विकल्प नहीं है।
