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उत्तराखंड में 83 हजार पेड़ कटे, RTI से खुलासा

LOKLENS NEWS|उत्तराखंड|

उत्तराखंड में अवसंरचना विकास की तेज रफ्तार के बीच एक चिंताजनक खुलासा सामने आया है। सूचना के अधिकार (RTI) के माध्यम से प्राप्त जानकारी के अनुसार, राज्य में विभिन्न सड़क और राजमार्ग परियोजनाओं के लिए 83,000 से अधिक पेड़ों की कटाई की गई है। यह आंकड़ा विशेष रूप से राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) से जुड़ी परियोजनाओं के संदर्भ में सामने आया है।

हिमालयी राज्य उत्तराखंड अपनी जैव-विविधता, घने वनों और जल स्रोतों के लिए जाना जाता है। ऐसे में इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई ने पर्यावरणविदों और स्थानीय समुदायों के बीच चिंता पैदा कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में वनों की अंधाधुंध कटाई केवल पारिस्थितिकी संतुलन ही नहीं बिगाड़ती, बल्कि भूस्खलन, बाढ़ और जल संकट जैसी समस्याओं को भी बढ़ा सकती है।

राज्य में पिछले कुछ वर्षों में चारधाम सड़क परियोजना, राजमार्ग चौड़ीकरण और अन्य निर्माण कार्य तेजी से हुए हैं। सरकार का तर्क है कि बेहतर सड़क नेटवर्क से पर्यटन, व्यापार और आपदा प्रबंधन में मदद मिलेगी। लेकिन दूसरी ओर पर्यावरण विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि क्या विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखा जा रहा है।

हिमालयी क्षेत्र भूगर्भीय रूप से संवेदनशील माना जाता है। यहां की मिट्टी ढीली और पहाड़ अपेक्षाकृत युवा हैं। ऐसे में पेड़ों की जड़ों द्वारा मिलने वाला प्राकृतिक सहारा अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। जब बड़े पैमाने पर वृक्ष हटाए जाते हैं, तो मिट्टी का क्षरण बढ़ता है और भूस्खलन की घटनाएं अधिक हो सकती हैं। हाल के वर्षों में उत्तराखंड में लैंडस्लाइड और फ्लैश फ्लड की घटनाओं में वृद्धि दर्ज की गई है।

पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि कटे हुए पेड़ों के बदले समान संख्या में प्रभावी पुनर्वनीकरण नहीं किया गया, तो दीर्घकालिक नुकसान और गंभीर हो सकता है। हालांकि आधिकारिक नियमों के तहत प्रत्येक कटे पेड़ के बदले पौधारोपण अनिवार्य होता है, लेकिन अक्सर यह सवाल उठता है कि लगाए गए पौधे कितने जीवित रहते हैं और क्या वे मूल वन क्षेत्र के पारिस्थितिक महत्व की बराबरी कर पाते हैं।

स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि वनों की कटाई का सीधा असर जल स्रोतों पर पड़ता है। कई पहाड़ी गांवों में पहले से ही जलसंकट की समस्या बनी हुई है। पेड़ों की कमी से वर्षा जल का संचयन घटता है, जिससे गर्मियों में जल स्रोत सूखने लगते हैं।

इस मुद्दे ने राज्य में विकास बनाम पर्यावरण की बहस को फिर से तेज कर दिया है। जहां एक ओर आधुनिक सड़कें और बेहतर संपर्क व्यवस्था आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देती हैं, वहीं दूसरी ओर पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने का खतरा भी उतना ही बड़ा है।

विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए विस्तृत पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) को पारदर्शी और वैज्ञानिक तरीके से लागू किया जाए। साथ ही, ढलानों की स्थिरता के लिए जैव-इंजीनियरिंग तकनीकों और स्थानीय प्रजातियों के पुनर्वनीकरण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

यह भी आवश्यक है कि परियोजनाओं की योजना बनाते समय स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। सतत विकास का अर्थ केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि पर्यावरण और समाज के बीच संतुलन स्थापित करना भी है।

RTI से सामने आया यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं, बल्कि हिमालयी पारिस्थितिकी के लिए चेतावनी का संकेत है। यदि विकास की रफ्तार के साथ पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय मजबूत नहीं किए गए, तो भविष्य में इसका असर केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मैदानी क्षेत्रों की जल और खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।

उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में हर विकास परियोजना को दीर्घकालिक पर्यावरणीय दृष्टिकोण से देखना अनिवार्य है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और संबंधित एजेंसियां इन चिंताओं का समाधान किस प्रकार करती हैं और पुनर्वनीकरण व संरक्षण के लिए कौन से ठोस कदम उठाए जाते हैं।

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