एरोली क्षेत्र की गंभीर समस्याएँ कृषि भूमि में चीड़ का संकट
LOKLENS NEWS|रानीखेत|
पूर्व जिला पंचायत सदस्य महेश आर्या द्वारा एरोली–किलकोट क्षेत्र की गंभीर ग्रामीण समस्याओं को उठाते हुए प्रशासन को दो महत्वपूर्ण ज्ञापन सौंपे गए, जिनमें कृषि भूमि में बढ़ते चीड़ के पेड़ों की समस्या, पशुपालकों को चारे की कमी और ग्रामीण महिलाओं द्वारा जलावन के लिए जोखिमपूर्ण परिस्थितियों में जाने जैसी चुनौतियाँ प्रमुख रूप से शामिल हैं। उन्होंने “सरकार जनता के द्वार” कार्यक्रम के तहत मुख्य वन संरक्षक, संयुक्त मजिस्ट्रेट, तहसील प्रशासन और वन विभाग को यह जानकारी दी कि क्षेत्र की उपजाऊ कृषि भूमि पर चीड़ के पेड़ तेजी से फैल रहे हैं, जिससे खेती-बाड़ी लगभग बाधित हो चुकी है। पिरूल गिरने से मिट्टी की उर्वरता कम हो रही है, खेतों की नमी खत्म हो रही है और कई स्थानों पर फसल उत्पादन अत्यधिक प्रभावित होने लगा है। ग्रामीणों के अनुसार चीड़ की बढ़ती संख्या के कारण कई खेत अनुपयोगी होते जा रहे हैं और परंपरागत खेती संकट में है।
ग्रामीणों ने यह भी बताया कि कृषि क्षेत्र का बिगड़ना उनकी आजीविका पर सीधा असर डाल रहा है, क्योंकि खेती के साथ-साथ पशुपालन भी इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है। लेकिन वर्तमान में चारे की उपलब्धता बेहद कम हो चुकी है। महेश आर्या ने मुख्यमंत्री की पूर्व घोषणा का हवाला देते हुए कहा कि पशुपालकों को समय पर चारा उपलब्ध कराने के लिए सरकार द्वारा किए गए आश्वासनों का अभी तक उचित क्रियान्वयन नहीं हुआ, जिसके कारण ग्रामीण पशुपालकों को बाजार से महंगा चारा खरीदने की मजबूरी है और पशुपालन की लागत बढ़ती जा रही है।
दूसरे ज्ञापन में एक और गंभीर मुद्दा सामने आया—एरोली–किलकोट क्षेत्र की ग्रामीण महिलाओं को जलावन के लिए प्रतिदिन कई किलोमीटर दूर, तीखे और फिसलन भरे जंगलों में जाना पड़ता है। ज्ञापन में बताया गया कि यह रास्ते न केवल कठिन हैं बल्कि जंगली जानवरों का खतरा भी निरंतर बना रहता है। कई महिलाओं के फिसलने और चोटिल होने की घटनाएँ सामने आई हैं, जबकि कुछ स्थानों पर ऐसी दुर्घटनाओं के बाद चिकित्सा सुविधा दूर होने के कारण राहत देर से मिलती है। ग्रामीण परिवारों ने बताया कि जलावन की बढ़ती कमी के कारण महिलाओं का जोखिम और बढ़ गया है, खासकर सर्दियों में जब जलावन की आवश्यकता सबसे अधिक होती है। पानी, खाना पकाने और घरेलू कार्यों के लिए ग्रामीण परिवार जलावन पर ही निर्भर हैं, लेकिन वन विभाग और पंचायत स्तर पर पर्याप्त विकल्प उपलब्ध न होने से महिलाएँ प्रतिदिन खतरा उठाने के लिए मजबूर हैं।
महेश आर्या ने प्रशासन को यह भी अवगत कराया कि वन विभाग की अनुमति प्रक्रिया अत्यधिक जटिल है। ग्रामीणों के आवेदन लंबे समय तक लंबित रहते हैं और चीड़ के पेड़ों के निस्तारण या वैकल्पिक जलावन की व्यवस्था को लेकर विभागीय कार्रवाई समय पर नहीं होती। ग्रामीणों ने मांग की है कि कृषि भूमि से चीड़ हटाने की अनुमति सरल की जाए, ग्राम पंचायतों को निर्णय प्रक्रिया में औपचारिक रूप से शामिल किया जाए और निस्तारण कार्य में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दी जाए ताकि रोजगार के अवसर भी उत्पन्न हों। ज्ञापन में कहा गया कि यदि सरकार चीड़ से राजस्व प्राप्त करना चाहती है, तो यह कार्य स्थानीय श्रमिकों की सहभागिता के साथ किया जाए, जिससे जनहित और सरकारी लाभ दोनों सुनिश्चित हों।
इन ज्ञापनों की प्रतिलिपि सांसद, विधायक, मुख्य वन संरक्षक, उप वन संरक्षक, तहसीलदार और अन्य संबंधित अधिकारियों को भेजी गई है। ग्रामीणों की अपेक्षा है कि चीड़ निस्तारण, चारा उपलब्धता, जलावन संकट और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर त्वरित हस्तक्षेप किया जाए। ग्रामीणों का कहना है कि ये समस्याएँ केवल एरोली–किलकोट तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे पर्वतीय क्षेत्र की सामुदायिक वास्तविकताओं को दर्शाती हैं। यदि समय पर प्रशासनिक कार्रवाई होती है, तो किसानों, पशुपालकों और ग्रामीण महिलाओं को बड़ी राहत मिलेगी और क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा दोनों मजबूत होंगी

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