रानीखेत की किरन भगत बनीं ऐपण लोक कला की पहचान, देश-विदेश तक पहुँचा हुनर
LOKLENS | रानीखेत
उत्तराखंड की पारंपरिक लोक कला ऐपण को नई पहचान दिलाने में रानीखेत में निवास कर रही किरन भगत का महत्वपूर्ण योगदान सामने आ रहा है। मूल रूप से ग्राम अमोली (विनायक), तहसील भिकियासैंण की निवासी किरन भगत वर्तमान में रानीखेत में रहकर एक कपड़ों की दुकान में कार्यरत हैं।
दुकान में कार्य करने के साथ-साथ किरन भगत ऐपण लोक कला के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में लगातार सक्रिय हैं। उनका मानना है कि ऐपण केवल सजावटी कला नहीं, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति, परंपरा और धार्मिक आस्था का सजीव प्रतीक है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना अत्यंत आवश्यक है।
किरन भगत ने सोशल मीडिया को माध्यम बनाकर ऐपण कला को देश-विदेश तक पहुँचाया है। उनके द्वारा तैयार किए गए ऐपण देहरादून, हैदराबाद, मुंबई, उत्तर प्रदेश और गुजरात सहित कई राज्यों तक पहुँच चुके हैं। उनकी कला ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बनाई है और अमेरिका तक सराहना प्राप्त की है।
किरन भगत का कहना है कि डिजिटल माध्यम आज लोक कला को जीवित रखने और नई पहचान दिलाने का सबसे सशक्त साधन बन चुका है। उनका उद्देश्य ऐपण लोक कला को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाना और युवाओं को इस पारंपरिक कला से जोड़ना है।
स्थानीय लोगों और कला प्रेमियों द्वारा किरन भगत के प्रयासों की भूरि-भूरि प्रशंसा की जा रही है। उनका यह कार्य न केवल ऐपण लोक कला को नया जीवन दे रहा है, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूती से स्थापित कर रहा है।
किरन भगत के पिता सतीश चंद्र भगत तथा माता भगवती देवी हैं। परिवार का पारंपरिक व्यवसाय दुग्ध उत्पादन है, जबकि किरन भगत अपने परिश्रम और कला साधना से एक नई पहचान गढ़ रही हैं।
