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जब सुरक्षा देने वाली पुलिस पर ही सवाल उठें, तो न्याय के भरोसे का क्या होगा?

📅 06 Oct 2026 👤 Loklens News Team 📁 देश
जब सुरक्षा देने वाली पुलिस पर ही सवाल उठें, तो न्याय के भरोसे का क्या होगा?

दिल्ली में महिला पत्रकारों की ओर से पुलिसकर्मियों पर कथित दुर्व्यवहार की शिकायत और उसके बाद न्याय की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों में हिरासत की कार्रवाई ने कई सवाल खड़े किए हैं। शिकायतों को क्राइम ब्रांच को जांच के लिए भेजा गया है। ऐसे में जरूरी है कि शिकायतकर्ता और आरोपी दोनों के अधिकारों की रक्षा करते हुए जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से पूरी हो।

नई दिल्ली। जब सुरक्षा देने वाली संस्था पर ही किसी नागरिक के साथ कथित दुर्व्यवहार के आरोप लगें, तो मामला केवल एक शिकायत तक सीमित नहीं रहता। यह सवाल भी उठता है कि शिकायतकर्ता को न्याय की प्रक्रिया में कितना भरोसा महसूस होता है और संबंधित संस्थाएं उस भरोसे को बनाए रखने के लिए क्या कदम उठाती हैं।
दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की कवरेज के दौरान तीन महिला पत्रकारों ने पुलिसकर्मियों पर कथित दुर्व्यवहार के आरोप लगाए हैं। पुलिस के अनुसार, तीनों शिकायतों को निष्पक्ष जांच के लिए क्राइम ब्रांच को भेजा गया है।
इसके बाद शिकायतों पर FIR और कार्रवाई की मांग को लेकर पत्रकारों और समर्थकों की ओर से प्रदर्शन किए गए। इस दौरान कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई। पुलिस का कहना है कि क्षेत्र में निषेधाज्ञा लागू थी और निर्देशों का पालन नहीं करने पर कानून-व्यवस्था के तहत कार्रवाई की गई।
कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है और किसी भी हिरासत की वैधता उसके कानूनी आधार से तय होती है। लेकिन जब प्रदर्शन करने वाले लोगों में वही लोग भी शामिल हों, जो कथित पुलिस दुर्व्यवहार की शिकायत पर कार्रवाई की मांग कर रहे हों, तब पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
पुलिस से सुरक्षा चाहिए, डर नहीं
पुलिस आम नागरिक के लिए सुरक्षा और कानून के भरोसे का प्रतीक है। किसी महिला को परेशानी हो, किसी नागरिक के साथ अपराध हो या किसी पत्रकार को रिपोर्टिंग के दौरान सुरक्षा की जरूरत हो—ऐसे समय में उम्मीद पुलिस से ही की जाती है।
इसीलिए यदि किसी शिकायतकर्ता को यह महसूस होने लगे कि अपनी शिकायत उठाने के कारण उसे ही पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है, तो संस्थागत भरोसे को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हिरासत में लिया गया प्रत्येक व्यक्ति गलत तरीके से हिरासत में लिया गया। पुलिस के पास कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है। लेकिन ऐसे मामलों में यह स्पष्ट होना चाहिए कि कार्रवाई किस कानूनी आधार पर की गई और क्या शिकायतकर्ता के अधिकारों का पूरा ध्यान रखा गया।
सबसे असहज सवाल
5 अक्टूबर को जारी दिल्ली सरकार के आदेश में ACP विवेक भगत समेत 12 DANIPS अधिकारियों को Additional DCP के पद का current duty charge दिया गया था। बाद में सरकार ने स्पष्ट किया कि यह नियमित पदोन्नति नहीं थी और विवेक भगत के संबंध में यह अतिरिक्त duty charge रोक दिया गया। सरकार के अनुसार यह प्रस्ताव 25 अगस्त को शुरू हुआ था, यानी मौजूदा विवाद से पहले, लेकिन जांच पूरी होने तक भगत ने स्वयं यह जिम्मेदारी न लेने का अनुरोध किया।
इसलिए इस घटनाक्रम को सीधे “आरोपी पुलिस अधिकारी को प्रमोशन दे दिया गया” कहना पूरी तरह सही नहीं होगा। हालांकि, जब किसी अधिकारी से जुड़े गंभीर आरोपों की जांच चल रही हो, तब उससे संबंधित प्रशासनिक फैसलों में पारदर्शिता जरूरी हो जाती है, ताकि निष्पक्षता को लेकर सवाल न उठें।
आरोपी को भी अधिकार, शिकायतकर्ता को भी
आरोप लगना दोष सिद्ध होना नहीं है। जिस अधिकारी पर आरोप लगाए गए हैं, उसे भी निष्पक्ष जांच और कानून के तहत अपना पक्ष रखने का अधिकार है।
वहीं शिकायतकर्ता का भी अधिकार है कि उसकी शिकायत को गंभीरता से लिया जाए, उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार हो और उसे किसी दबाव का सामना न करना पड़े।
न्याय का अर्थ आरोपी को पहले से दोषी घोषित करना नहीं है और न ही शिकायतकर्ता को पहले से गलत मान लेना। न्याय का अर्थ है—स्वतंत्र जांच, उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा और निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया।
हिरासत पर सवाल सिर्फ कार्रवाई का नहीं, संदेश का भी है
अगर पुलिस किसी प्रदर्शनकारी को कानून-व्यवस्था के आधार पर हिरासत में लेती है तो कार्रवाई का कानूनी आधार स्पष्ट होना चाहिए। लेकिन जब उसी घटनाक्रम में कोई पत्रकार अपने साथ कथित पुलिस दुर्व्यवहार की शिकायत लेकर न्याय की मांग कर रही हो और वह भी पुलिस कार्रवाई का सामना करती दिखाई दे, तो इसका सार्वजनिक संदेश गंभीर हो सकता है।
जरूरत है कि पुलिस प्रशासन केवल यह न बताए कि किसे और क्यों हिरासत में लिया गया, बल्कि यह भी सुनिश्चित करे कि किसी शिकायतकर्ता की वैध आवाज को कानून-व्यवस्था के नाम पर दबाया नहीं जा रहा है।
पत्रकार के साथ-साथ जनता का सवाल
यह मामला किसी पत्रकार को विशेष सुविधा देने की मांग नहीं है। पत्रकार भी कानून के अधीन है। लेकिन पत्रकार होने के कारण उसे अपने अधिकारों से वंचित भी नहीं किया जा सकता।
जब वही पत्रकार पुलिस के खिलाफ शिकायत करती है, तो उसकी शिकायत की जांच अधिक पारदर्शी और स्वतंत्र होना जरूरी है, ताकि जनता को भरोसा रहे कि जांच निष्पक्ष तरीके से हो रही है।
क्राइम ब्रांच को जांच सौंपना एक कदम है, लेकिन जनता के भरोसे के लिए जांच की पारदर्शिता और उसका निष्कर्ष भी महत्वपूर्ण होगा। उपलब्ध CCTV और डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखना भी जांच का अहम हिस्सा होना चाहिए।
हमारी मांग स्पष्ट है
पत्रकारों की शिकायतों की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच हो। उपलब्ध CCTV और डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखा जाए। शिकायतकर्ता को किसी भी प्रकार के दबाव से सुरक्षा मिले और हिरासत की प्रत्येक कार्रवाई का कानूनी आधार स्पष्ट किया जाए।
साथ ही आरोपी अधिकारी को भी निष्पक्ष जांच और अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार मिले। जांच पूरी होने तक किसी भी पक्ष को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो पद या वर्दी की परवाह किए बिना कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
आखिर में सबसे बड़ा सवाल
पुलिस का काम सिर्फ कानून लागू करना नहीं, बल्कि जनता के मन में कानून के प्रति विश्वास बनाए रखना भी है।
जब कोई महिला संकट में हो तो पुलिस उसका सहारा बने।जब कोई पत्रकार काम कर रहा हो तो उसकी सुरक्षा सुनिश्चित हो। जब कोई नागरिक शिकायत लेकर आए तो उसकी बात सुनी जाए।
और जब शिकायत पुलिस के किसी अधिकारी के खिलाफ हो, तो जांच ऐसी हो कि शिकायतकर्ता को यह महसूस न हो कि वह अकेली और असहाय है।
जिस पुलिस से सुरक्षा की उम्मीद हो, अगर वही डर का कारण बन जाए, तो नागरिक न्याय की उम्मीद लेकर किस दरवाजे पर जाए?
पत्रकार को विशेष न्याय नहीं चाहिए। उसे वही न्याय चाहिए जो इस देश के हर नागरिक का अधिकार है—निष्पक्ष जांच, कानून के मुताबिक प्रक्रिया और सच सामने आने का भरोसा।
यही लोकतंत्र है। यही कानून का राज है और यही जनता का भरोसा बचाने का रास्ता है।