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ग्रामीण रोजगार योजना में बदलाव: सरकार के फैसले पर अर्थशास्त्रियों और नोबेल विजेताओं की आलोचना

LokLens News | अर्थव्यवस्था व नीति डेस्क

भारत सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) में बड़े स्तर पर बदलाव किए हैं। संशोधित ढांचे के तहत गारंटीड काम के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 किया गया है, लेकिन साथ ही वित्तीय जिम्मेदारी का बड़ा हिस्सा राज्यों पर डाला गया है और नियंत्रण व प्रक्रियाएं कड़ी की गई हैं।

सरकार का कहना है कि ये बदलाव देश की समग्र विकास रणनीति का हिस्सा हैं और इससे योजना में पारदर्शिता, दक्षता और परिणामोन्मुखी क्रियान्वयन सुनिश्चित होगा। अधिकारियों के मुताबिक, सख्त निगरानी से धन के दुरुपयोग पर रोक लगेगी और राज्यों की भागीदारी बढ़ेगी।

हालांकि, इन सुधारों को लेकर अर्थशास्त्रियों और नोबेल पुरस्कार विजेताओं सहित कई विशेषज्ञों ने कड़ी आपत्ति जताई है। आलोचकों का कहना है कि राज्यों पर बढ़ता वित्तीय बोझ—खासकर उन राज्यों में जो पहले से राजकोषीय दबाव में हैं—मजदूरी भुगतान में देरी और काम की उपलब्धता में कमी का कारण बन सकता है। इससे MGNREGA की ग्रामीण सुरक्षा कवच (सेफ्टी नेट) की भूमिका कमजोर पड़ने का खतरा है।

विशेषज्ञों ने यह भी चेताया है कि प्रक्रियात्मक सख्ती और अतिरिक्त औपचारिकताएं सबसे गरीब और कमजोर तबकों की भागीदारी को हतोत्साहित कर सकती हैं—जबकि सूखा, कृषि संकट या आर्थिक मंदी के समय यही वर्ग योजना पर सबसे अधिक निर्भर रहता है।

MGNREGA को लंबे समय से ग्रामीण भारत में आय सुरक्षा, रोजगार और गरीबी न्यूनीकरण का अहम साधन माना जाता रहा है। विश्लेषकों के अनुसार, यदि योजना की पहुंच या भरोसेमंद क्रियान्वयन प्रभावित हुआ, तो इसका असर ग्रामीण खपत, सामाजिक स्थिरता और समावेशी विकास पर भी पड़ सकता है।

नीति और अकादमिक हलकों में अब यह मांग तेज हो रही है कि सरकार सुधारों के साथ अतिरिक्त सुरक्षा प्रावधान सुनिश्चित करे, ताकि योजना अपनी मूल भावना के अनुरूप ग्रामीण परिवारों के लिए प्रभावी जीवनरेखा बनी रहे।

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