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अल्मोड़ा में सांस्कृतिक जुलूस निकला, शहीदों को श्रद्धांजलि और जनगीतों से गूंजा माहौल

LOKLENS NEWS |अल्मोड़ा|

अल्मोड़ा में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम के तहत एक भव्य जुलूस निकाला गया, जिसकी शुरुआत गांधीपार्क चौघानपाटा से हुई। यह जुलूस मालरोड, मिलन चौक, लाला बाजार, चौक बाजार और धारानौला मार्ग होते हुए जिलापंचायत सभागार पहुंचा। पूरे मार्ग में सांस्कृतिक उत्साह और जनभागीदारी देखने को मिली, जहां बड़ी संख्या में लोग इस आयोजन का हिस्सा बने।

जुलूस के दौरान शिखर तिराहा स्थित शहीद पार्क और जिलापंचायत परिसर में स्वर्गीय रामसिंह धौनी की प्रतिमा पर फूल अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। इस अवसर पर मौजूद लोगों ने उनके योगदान को याद करते हुए सम्मान प्रकट किया। कार्यक्रम में जनकवि Girda के जनगीतों ने माहौल को और भी जीवंत बना दिया। इन गीतों के माध्यम से उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान और जनभावनाओं की झलक साफ तौर पर देखने को मिली।

इस कार्यक्रम में अल्मोड़ा सहित प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से पत्रकार, लेखक, कवि और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े सैकड़ों लोग शामिल हुए। यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक जुलूस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे एक वैचारिक मंच के रूप में भी प्रस्तुत किया गया, जहां राज्य के विकास और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा की गई।

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जिलापंचायत सभागार पहुंचने के बाद “उत्तराखंड राज्य के 25 साल” विषय पर एक व्याख्यान सत्र का आयोजन किया गया। इस सत्र में वरिष्ठ पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने राज्य के गठन से लेकर अब तक के सफर, चुनौतियों और उपलब्धियों पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार पीसी तिवारी, सुरेश नौटियाल, चारू तिवारी, राजीव लोचन साह, जनकवि बल्ली सिंह चीमा, गोविंद पंत राजू, अल्मोड़ा प्रेस क्लब के अध्यक्ष जगदीश जोशी, प्रकाश पंत, मुकुल, ईश्वर जोशी, डॉ. निर्मल जोशी और आनंद सिंह राणा सहित कई वक्ताओं ने अपने विचार साझा किए।

कार्यक्रम का संचालन विभु कृष्णा द्वारा किया गया, जबकि चंद्र शेखर द्विवेदी और रमेश जोशी संचालन मंडल में शामिल रहे। वक्ताओं ने अपने संबोधन में उत्तराखंड के 25 वर्षों की यात्रा का विश्लेषण करते हुए विकास, पलायन, रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे मुद्दों पर चर्चा की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि राज्य के भविष्य के लिए संतुलित विकास और स्थानीय संसाधनों का सही उपयोग आवश्यक है।

अल्मोड़ा के पत्रकारों ने इस पूरे आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाई। आयोजक मंडल की विभिन्न समितियों के माध्यम से स्थानीय पत्रकारों ने कार्यक्रम को सफल बनाने में सहयोग दिया। इस आयोजन ने एक बार फिर यह दिखाया कि सांस्कृतिक कार्यक्रम केवल परंपराओं का उत्सव नहीं होते, बल्कि वे समाज को जोड़ने और विचारों को साझा करने का भी माध्यम बनते हैं।

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