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उत्तराखंड में व्यावसायिक शिक्षा ठप: 200+ स्कूल प्रभावित, 300 प्रशिक्षक 25 दिन से बेरोजगार”

LOKLENS NEWS |Dehradun।

उत्तराखंड में व्यावसायिक शिक्षा व्यवस्था इन दिनों गंभीर संकट से गुजर रही है। 31 मार्च को आउटसोर्सिंग कंपनी का टेंडर समाप्त होते ही 1 अप्रैल से लगभग 300 व्यावसायिक प्रशिक्षक कार्यमुक्त हो गए, जिसके कारण राज्य के करीब 200 हब और 28 स्पोक सरकारी विद्यालयों में कौशल आधारित शिक्षा पूरी तरह ठप हो गई है। इस स्थिति ने न केवल प्रशिक्षकों को बेरोजगारी के संकट में डाल दिया है, बल्कि हजारों छात्र-छात्राओं के भविष्य पर भी सीधा प्रभाव डाला है।

पिछले 25 दिनों से प्रभावित प्रशिक्षक अपनी मांगों को लेकर देहरादून में धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने जिला मजिस्ट्रेट को ज्ञापन सौंपते हुए स्पष्ट किया कि यह केवल रोजगार का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत चल रहे कौशल विकास कार्यक्रम का सवाल है। प्रदर्शन के दौरान प्रशासन ने उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुनते हुए कार्रवाई का आश्वासन दिया, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है।

प्रशिक्षकों ने मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami से सीधे मुलाकात की मांग भी उठाई है, ताकि वे अपनी समस्याएं और मांगें सीधे सरकार के समक्ष रख सकें। उनका कहना है कि बिना किसी स्पष्ट आदेश के उन्हें घर बैठा दिया गया है, जो न केवल उनके रोजगार के लिए खतरा है बल्कि शिक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर असर डाल रहा है।

तथ्यों के अनुसार, शिक्षा विभाग ने व्यावसायिक शिक्षा कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा था, लेकिन अब तक अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। इसके चलते 200 हब और 28 स्पोक विद्यालयों में कार्यक्रम पूरी तरह रुक गया है, जबकि प्रदेश के अन्य 331 विद्यालयों में यह व्यवस्था पहले की तरह चल रही है। यह असमानता कई सवाल खड़े करती है कि आखिर कुछ विद्यालयों में ही यह कार्यक्रम क्यों बंद किया गया।

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वोकेशनल ट्रेनर एसोसिएशन, उत्तराखंड के अध्यक्ष Tushar Pandey ने कहा कि यह केवल नौकरी जाने का मामला नहीं है, बल्कि हजारों विद्यार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि सभी प्रशिक्षकों को तत्काल बहाल किया जाए और व्यावसायिक शिक्षा कार्यक्रम को पुनः शुरू किया जाए। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।

यह मुद्दा राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के उस लक्ष्य पर भी सवाल उठाता है, जिसमें कौशल आधारित शिक्षा को प्राथमिकता दी गई है। जब नीति स्तर पर इस प्रकार की शिक्षा को बढ़ावा देने की बात कही जाती है, तब जमीनी स्तर पर उसका ठप हो जाना नीति और क्रियान्वयन के बीच की दूरी को उजागर करता है।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आउटसोर्सिंग आधारित व्यवस्थाएं कितनी अस्थिर हो सकती हैं। प्रशिक्षकों का कहना है कि स्थायी समाधान के बिना इस तरह की समस्याएं बार-बार सामने आती रहेंगी, जिससे शिक्षा व्यवस्था प्रभावित होती रहेगी।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार इस संकट को गंभीरता से लेते हुए तत्काल कदम उठाएगी, या फिर हजारों विद्यार्थियों और सैकड़ों परिवारों का भविष्य अनिश्चितता में ही रहेगा।

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