रानीखेत। उत्तराखंड में सरकारी जमीनों और सार्वजनिक संपत्तियों के इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक बहस तेज होती दिखाई दे रही है। रानीखेत कांग्रेस कमेटी के जिलाध्यक्ष दीपक किरौला ने प्रेस नोट जारी कर राज्य सरकार पर सरकारी विभागों की बेशकीमती जमीनों और संपत्तियों को निजी हाथों में सौंपने की दिशा में आगे बढ़ने का आरोप लगाया है। कांग्रेस नेता ने कहा कि सरकारी संपत्तियों को लीज और पीपीपी मॉडल के माध्यम से निजी कंपनियों को दिए जाने की प्रक्रिया को लेकर सरकार को पूरी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए।
दीपक किरौला ने उत्तराखंड निवेश एवं अवसंरचना विकास बोर्ड (UIIDB) के माध्यम से सरकारी भूमि को निवेश परियोजनाओं के लिए उपलब्ध कराने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राज्य की सरकारी जमीन जनता की संपत्ति है और इसके इस्तेमाल या दीर्घकालीन लीज से जुड़े फैसलों में पारदर्शिता तथा सार्वजनिक हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
कांग्रेस की ओर से हाल में करीब 7,000 बीघा सरकारी भूमि को लंबे समय की लीज पर देने की तैयारी का आरोप लगाया गया था। हालांकि, राज्य सरकार ने इन आरोपों को तथ्यात्मक रूप से गलत बताया है। सरकार की ओर से कहा गया है कि UIIDB के पास फिलहाल 45 एकड़ भूमि ही उपलब्ध है और 90 वर्ष की लीज दिए जाने की बात भी सही नहीं है। ऐसे में सरकारी भूमि के वास्तविक आंकड़ों और प्रस्तावित परियोजनाओं को लेकर सरकार और विपक्ष के दावों में अंतर सामने आया है।
किरौला ने मसूरी स्थित जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट का उदाहरण देते हुए सरकारी संपत्तियों के निजी संचालन को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि लगभग 142 एकड़ भूमि और वहां विकसित पर्यटन सुविधाओं को निजी संचालक को दिए जाने का मामला यह सवाल खड़ा करता है कि सार्वजनिक संपत्तियों का व्यावसायिक इस्तेमाल किस प्रकार और किन शर्तों के तहत किया जा रहा है।
जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट से जुड़े मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट के जनवरी 2026 के आदेश में 142 एकड़ भूमि के सफल बोलीदाता को दिए जाने का उल्लेख किया गया है। कांग्रेस ने इस मामले को लेकर सरकारी संपत्तियों के इस्तेमाल की प्रक्रिया और उससे जुड़े निर्णयों को सार्वजनिक किए जाने की मांग की है।
दीपक किरौला ने कहा कि सरकारी जमीन केवल सरकार की संपत्ति नहीं, बल्कि जनता की साझा धरोहर है। इसलिए यदि किसी सरकारी भूमि या संपत्ति को लीज, पीपीपी अथवा किसी अन्य व्यवस्था के तहत निजी संस्था को दिया जाता है तो उसकी प्रक्रिया, भूमि का मूल्यांकन, लीज की अवधि, चयनित संस्था और अनुबंध की शर्तों की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।
कांग्रेस जिलाध्यक्ष ने सरकार से यह स्पष्ट करने की मांग की कि राज्य में किन-किन सरकारी जमीनों और संपत्तियों को निवेश या पर्यटन परियोजनाओं के लिए चिन्हित किया गया है। उन्होंने यह भी पूछा कि ऐसी भूमि किस संस्था या कंपनी को दी जा रही है, इसकी अवधि कितनी है और इसके बदले सरकार को क्या आर्थिक अथवा सार्वजनिक लाभ प्राप्त होगा।
कांग्रेस ने संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे को जनता के बीच उठाएगी। पार्टी का कहना है कि सरकारी संपत्तियों से जुड़े निर्णयों की जानकारी सार्वजनिक होने से लोगों को यह समझने में मदद मिलेगी कि राज्य की जमीन का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा है और उससे प्रदेश को क्या लाभ मिलेगा।
वहीं, सरकार द्वारा 7,000 बीघा भूमि और 90 वर्ष की लीज से जुड़े आरोपों को गलत बताए जाने के बाद इस पूरे मामले में आधिकारिक दस्तावेजों और परियोजना-वार जानकारी महत्वपूर्ण हो जाती है। राजनीतिक आरोपों और सरकारी दावों के बीच वास्तविक स्थिति समझने के लिए भूमि रिकॉर्ड, संबंधित निविदाएं, लीज समझौते और परियोजनाओं की स्वीकृत शर्तों की जांच आवश्यक होगी।
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में सरकारी भूमि और सार्वजनिक संपत्तियों का इस्तेमाल संवेदनशील विषय रहा है। पर्यटन, निवेश और बुनियादी ढांचे के विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी सरकार के लिए एक विकल्प हो सकती है, लेकिन ऐसे मामलों में पारदर्शिता और स्पष्ट नियमों की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। अब देखना होगा कि सरकार इस मुद्दे पर कितनी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक करती है और विपक्ष किन दस्तावेजों के आधार पर अपने सवालों को आगे बढ़ाता है।